बाल श्रम अधिनियम का उल्लंघन केवल होटलों कन्टीनो तक ही सीमित नहीं वरन कला के नाम पर हर जगह पैसा कमाने की गरज इसका उल्लंघन जारी है. इसके आधार में पेट की भूख हो अथवा यश की . अपने बच्चे को क़ानून की परवाह किए बिना जो माँ-बाप व्यावसायिक गतिविधि का हिस्सा बना देतें हैं उनके ख़िलाफ़ भी मौज़ूदा क़ानून का सख्ती से पालन कराना बेहद ज़रूरी है. यदि मौजूदा बाल श्रम क़ानून में नैसर्गिक अथवा अन्य श्रेणी के अभिभावक [ओं ] के लिए कम व्यवस्था हो तो इस दिशा में विचार ज़रूरी है .
सामाजिक दृष्टिकोण से यह सर्वथा ग़लत है की बच्चों का इस्तेमाल अर्थोत्पादक उपकरण के रूप में किया जाए . इस में खेल,कला,को भी विस्तार से परिभाषित करना ज़रूरी है, राज्य सरकारों / केन्द्र सरकार के ध्यान देने योग्य बात है यह की किस प्रकार ऐसे माँ बाप जो अपने बच्चों को व्यवसायिक कार्यों में शामिल कराने के दोषी पाए जाते हैं तो उनको विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
चित्र साभार : गूगल![]()
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