वेब दुनियाँ पर गायत्री शर्मा का आलेख चर्चा योग्य है गरबा परिधान पर "गरबों की शान पारंपरिक चणिया-चोली और केडि़या" जिसकी झलक आज समूचे गरबा आयोजनों में दिखाई देती है।
आवारा बंजारा की यह पोस्ट गरबा का जलवा भी समीचीन ही है .......जिसमें उन्हौने स्पष्ट किया है :-"ज का गुजरात नौवीं शताब्दी में चार भागों में बंटा हुआ था, सौराष्ट्र, कच्छ, आनर्ता (उत्तरी गुजरात) और लाट ( दक्षिणी गुजरात)। इन सभी हिस्सों के अलग अलग लोकनृत्य थे जिनके आधार पर हम कह सकते हैं कि आज गुजरात के लोकनृत्यों में गरबा, लास्या, रासलीला, डाँडिया रास, दीपक नृत्य, पणिहारी, टिप्पनी और झकोलिया प्रमुख है। अब सवाल यह उठता है कि करीब करीब मिलती जुलती शैली के बाद भी सिर्फ़ गरबा या डांडिया की ही नेशनल या इंटरनेशनल छवि क्यों बनी। शायद इसके पीछे इसका आसान होना, बिना एसेसरीज़ या अतिरिक्त उपकरणों-साधनों के किया जा सकना आदि प्रमुख कारण है। इसके अलावा और भी कारण हैं।"
यह सच है की व्यवसायिता का तत्व गरबा को घेर चुका है तो एस एम् एस/टेलीवोटिग/घडियाली आंसू बहाते मनोरंजक चैनलों से बेहतर है "गरबा '' पर विस्तार से जानकारी विकिपीडिया पर भी वहाँ के अन्य लोक नृत्यों के साथदी गयी है
संजीत भाई की पोस्ट में जो भी लिखा वह ग़लत कदापि नहीं है ,इस पर भाई संजय पटेल की की टिप्पणी "संजीत भाई;गरबा अपनी गरिमा और लोक-संवेदना खो चुका है।मैने तक़रीबन बीस बरस तक मेरे शहर के दो प्रीमियम आयोजनो में बतौर एंकर पर्सन शिरक़त की . अब दिल खट्टा हो गया है. सारा तामझाम कमर्शियल दायरों में है. पैसे का बोलबाला है इस पूरे खेल में और धंधे साधे जा रहे हैं.'' सही ही है किंतु मैं थोडा सा इतर सोच रहा हूँ कि व्यवसायिकता में बुराई क्या अगर गुजराती परिधान लोकप्रिय हो रहें है , और यदि सोचा जाए तो गरबा ही नहीं गिद्दा,भांगडा,बिहू,लावनी,सभी को सम्पूर्ण भारत ने सामूहिक रूप से स्वीकारा है केवल गरबा ही नहीं ये अलग बात है कि गरबा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के सहारे सबसे आगे हो गया।
दैनिक भास्कर समूह ने गरबे को गुजरात से बाहर अन्यप्रान्तों तक ले जाने की सफल-कोशिश की तो नई-दुनिया,ऍफ़ एम् चैनल्स भी अब पीछे नहीं रह गए हैं । इंदौर का गरबा, मस्कट में इस बार छाने गया है तो यह भारत के लिए गर्व की बात है । ये अलग बात है कि गरबे के लिए महिला साथी भी किराए , उपलब्ध होने जैसे समाचार आ ने लगे हैं ।
संजय पटेल जी उस व्यवसायिकता से परहेज कर रहे हैं जो उनने अपने शहर में देखी [ मेरे शहर में गरबा इन दिनों चौंका रहा है] इस दृश्य से हर कोई पहेज करेगा जो संजय भाई ने किया उनकी पोस्ट कहती है कि :
"चौराहों पर लगे प्लास्टिक के बेतहाशा फ़्लैक्स।गर्ल फ़्रैण्डस को चणिया-चोली की ख़रीददारी करवाते नौजवानदेर रात को गरबे के बाद (तक़रीबन एक से दो बजे के बीच) मोटरसायकलों की आवाज़ोंके साथ जुगलबंदी करते चिल्लाते नौजवानघर में माँ-बाप से गरबे में जाने की ज़िद करती जवान लड़कीगरबे के नाम पर लाखों रूपयों की चंदा वसूलीइवेंट मैनेजमेंट के चोचलेरोज़ अख़बारों में छपती गरबा कर रही लड़के-लड़कियों की रंगीन तस्वीरेंदेर रात गरबे से लौटी नौजवान पीढी न कॉलेज जा रही,न दफ़्तर,न बाप की दुकानकानफ़ोडू आवाज़ें जिनसे गुजराती लोकगीतों की मधुरता गुमफ़िल्मी स्टाइल का संगीत,हाइफ़ाई या यूँ कहे बेसुरा संगीतआयोजनों के नाम पर बेतहाशा भीड़...शरीफ़ आदमी की दुर्दशारिहायशी इलाक़ों के मजमें धुल,ध्वनि और प्रकाश का प्रदूषणबीमारों,शिशुओं,नव-प्रसूताओं को तकलीफ़नेतागिरी के जलवे ।मानों जनसमर्थन के लिये एक नई दुकान खुल गईनहीं हो पा रही है तो बस:वह आराधना ...वह भक्ति जिसके लिये गरबा पर्व गुजरात से चल कर पूरे देश में अपनी पहचान बना रहा है। देवी माँ उदास हैं कि उसके बच्चों को ये क्या हो गया है....गुम हो रही है गरिमा,मर्यादा,अपनापन,लोक-संगीत।माँ तुम ही कुछ करो तो करो...बाक़ी हम सब तो बेबस हैं !
न्यूयार्क के ब्लॉगर भाई चंद्रेश जी ने इसे अपने ब्लॉग Chandresh's IACAW Blog (The Original Chandresh), गरबा शीर्षक से पोष्ट छापी है जो देखने लायक है कि न्यूयार्क के भारत वंशी गरबा के लिए कितने उत्साही हैं
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